फ़िर आज चाँद रात थी, दिल में था अँधेरा व्याप्त
हमारी निगाहें थीं प्यासी, कंवारी सी
आँगन में आये थे प्रियतम मुझसे मिलने तुम,
व्याकुल एहसास थे बाकी और रात थी थोड़ी सहमी।
हम मौन, बिछड़न की चादर बिछा बैठे थे
हरसिंगार भी टूट-टूट कर बिखेर रही थी खुश्बू
चहुँ ओर चाँदनी पेड़ों के झुरमुट से
लुका छिपी खेल रही थी हमसे,
कि आके बरबस बादल ने जकड़ा था आगोश में अपने।
लाज की बेड़ियाँ थी पाँव में मेरे और तुम भी थे
न जाने किन कसमों से बँधे-बँधे से।
यकायक सागर सम विशाल भुजायें फ़ैलाये तुम
आतुर थे आलिंगन बद्ध होने को,
मैं चँचल उफ़नती नदी सी
समाँ गई तुम्हारे अगाध प्रेम में।
कहीं दूर पिहू-पिहू करता पपीहा भी चिहुँक उठा
चाँद को न देख क्रन्दन करता चातक भी
आस छोड़ बैठा आज न जाने क्यों।
उखड़ती साँसों को सहेजती,
अश्रुपूरित निगाहों से विदाई की इस बेला में
इतना ही कह पाई जाते-जाते
कुछ तेरे सपने, कुछ मेरे सपने..........
कुछ तेरे सपने, कुछ मेरे सपने..........।।
__ मौली

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