तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

१४- हमसफ़र





ज़ुल्फ़ों को मेरी खुलकर
अपने शानों पे बिखर जाने दे
आँखों से छलकती हुई मय को
होठों से पी जाने दे
मेरी साँसों को
अपनी साँसों में समा जाने दे
तारों को आसमाँ पे बिखर जाने दे
मौसम को थोड़ा और बदल जाने दे
बादलों को गरज कर बरस जाने दे
तूफ़ाँ को आकर गुजर जाने दे
जब साथ हो तुम मेरे हमसफ़र
तो कश्ती को मौजों पे उतर जाने दे।।

__ मौली

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