तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

३५- मेरे रहनुमा हो तुम





तलाशती थी सदियों से जिसे,
मेरे ख्वाबों की वो ताबीर हो तुम
जर्रे-जर्रे पर उकेरती रही
जिस अक्स को वो हाला हो तुम।।

जन्म-जन्मान्तर की मेरी तपस्या के वरदान हो तुम
मेरी तिमिर ज़िन्दगी में आफ़ताब बन आये हो तुम।।

मेरे सूने मरुथल में आबसार बन आये हो तुम
किसी देवता के भेजे हुए कोई दूत हो तुम।।

मेरे रहबर, मेरे रहनुमा हो तुम
.................मेरे रहनुमा हो तुम।।

__ मौली

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