तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

२१- आ बसा आँखों में कोई





गुमसुम सी बैठी मैं
किसी की यादों में खोई
आँखों से नींदें,
होठों से मुस्कान भी गुम है,
अचानक दिल में एक हूक सी उठी,
आत्मा रोई, हृदय चीत्कार उठा,
पर, आँख न जाने आज क्यों न रोई,
अचानक एक आँसू मेरी आँख से टपका,
मैंने पूछा, अरे तू क्यों बाहर छलक आया,
आँसू बोला, मैं कैसे रहूँ आँखों में,
वहाँ तो पहले से ही कोई और बसा है,
अब मेरी यहाँ क्या दरकार
अब न रहा मेरा इन आँखों से कोई सरोकार.....।।

__ मौली

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें