तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

२६- गीत विरह के





फ़िर आयी सँध्या सिंन्दूरी
फ़िर सुधियों के बादल छाये
फ़िर जागी अन्तर की पीड़ा
फ़िर अश्रुपूरित नयनों से
अविरल बहती अश्रुधार
फ़िर मन के सूने आँगन में
डोल गयी तेरी परछाँईं
फ़िर भूली गीत मिलन के
फ़िर गाये गीत विरह के।
फ़िर गाये गीत विरह के।।

__ मौली

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें