तू अजनबी इक
दस्तक
मैं बंदिशों में कैद
किवाड़
तू उश्रृंखल विशाल
सागर
मैं दायरों में बहती नदी
तू अपरिचित इक
मंज़िल
मैं चिर परिचित सी
पगडंडी
तू मांझे की तेज़ डोर
मैं कटी हुई इक
पतंग
तू सुर का तीव्र
सप्तक
मैं वीणा की शांत
झंकार
तू मदमस्त उन्मुक्त
बादल
मैं रिवाजों में जकड़ी धरती
तू रात का पहला प्रहर
मैं भोर की पहली
किरण
तू खिली धूप सी सुखद दोपहरी
मैं कोहरे की चादर में लिपटी सुखद शाम
मौली
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