तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

अनिर्वाण

दग्ध विदीर्ण ह्रदय
मेघ सा भीगा  मन
पर्वत सा ऊंचा होता
अभिमान
कैसे लांघा जाये,
बेदम सी है सांसे
थके थके से कदम
तोतली अतीत की
पोटली
वृद्ध जीर्ण कांधा,
कोहरे सी धुंधली
अश्रुपूरित नयन
विषय वासना की
अतृप्त पांडुलिपि,
कहानी किसकी
लिख रहा कौन
आस का धैर्यदीप
मरुस्थल की आंधी
यौवन को सहेजने
की अविराम चेष्टा
या तिलस्मी मोहपाश में
बंधा हमारा रिश्ता,
वृथा है ये अभिसार
अगम्य अनिर्वाण
प्रयत्न क्यों
जैसे पतझड़ में बादल की 
अंतहीन तलाश
या सांध्य पुष्पों का रात्रि तक सुगन्ध हीन होने की असाध्य पीड़ा.....

                       ।।  मौली।।

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