तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

रविवार, 30 दिसंबर 2018

अनूठा इश्क

प्रेम और विश्वास
के रंगीन धागों से
दिया था बुनने
एक रिश्ता
अनूठे प्रेम का
क्यों
तिश्नगी का
तानाबाना बुना,तूने
क्षणभंगुर देह की
लालसा का
मैंने जाना ही कब ?
किसी को कभी  -
 इन्तजार हमारा  था  ?
 बस एक भ्रम सुहाना सा था   
 के उनपे अधिकार हमारा था ......

                      मौली



शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

मन

हताश बैठी सोच रही थी दिल तन्हा था बेहद सोचा क्या करूँ ?इश्क ही करूँ प्रेम के पास गई वो बोला मैं रिटायर हो गया.....अब मेरा कहाँ ठिकाना मैं स्तब्ध..दौड़कर विश्वास के पास गई उसने बोला गैरन्टी पीरियड खत्म, निस्तब्ध...फिर मन से कहा तुम तो हो वो बोली,अब लाइफ टाइम आफर कहाँ, भागती रही बेतहाशा तभी मुझे स्वप्न मिला हठात मैंने लपक कर उसका हाथ थामा, हाथ छुड़ा वो बोला पगली,अब मुझे कोई नही देखता सब अब अपने अस्तीत्व को देखते है..... बिलख पड़ी मैं अनायास...ये क्या नितांत मैं असहाय! अचानक किसी का स्पर्श कांधे पे पाकर सिहर उठी...मुस्कुराकर वो बोली मैं हूँ उम्मीद जब तक मैं हूं तू क्यों बिलखती है........ मौली

शनिवार, 25 अगस्त 2018

आजमाईश

आज़माइश साज़िशें हैं मैं हूँ और क़िस्मत मिरी,
सोचती हूँ किसकी आँखों को छलकना चाहिए।
      मौली

सोमवार, 20 अगस्त 2018

ख्वाब

ख्वाबों का क्या है साहब वो तो अब पराये हो चले.... उम्मीद जिनसे थी वाबस्ता वो अब गैरों के मसीहा हो चले..... मौली

सोमवार, 13 अगस्त 2018

शरणार्थी

गहनतम घनेरी ह्र्दयस्थल में

एक अकेला शरणार्थी बन

आ जाओ जो मेरे जीवन में

सप्तसुर बन गूँजूं मैं

इन सुंदर फ़िज़ाओं में

जो बन आ जाओ इंद्रधनुष

सारे रंग मुझपे फब जायें

जो बन जाओ ओस की बूंदें

मेरे ख़ुश्क होंठ प्लावित हो जायें

जो तुम जुगनूं बन आ जाओ

मेरी स्याह रात प्रकाशित हो जायें।।

                          मौली
                     ~~~~~~~

बंद शामें

किसे बताऊं कितनी शामें बन्द कमरों में कैसे बिताई है

कितनी बेबसियों कितनी बेचैनियों में गुज़ारे हर लम्हे

सिफारिश की पिंजर से रूह के चले जाने की

न सरगोशियां ही काम आई न गुज़ारिशें मंज़ूर हुई

हिज़्र की रातें थी मेरी और सहर भी सज़ायाफ्ता

नींदे तो गिरवी रख आयी थी सपने भी बेमोल बिके

ख्वाहिशें सूद के किश्तों में बेशुमार जाने लगी

कपड़ों के बदले तन का सौदा न कर सकी कभी

मिले जो ग़म बेतहाशा उन्हें  हमसफ़र बना लिया

जिसे हमराज़ बनाया उसने ही मुझे  तार तार किया।।

                   मौली