प्रेम और विश्वास
के रंगीन धागों से
दिया था बुनने
एक रिश्ता
अनूठे प्रेम का
क्यों
तिश्नगी का
तानाबाना बुना,तूने
क्षणभंगुर देह की
लालसा का
मैंने जाना ही कब ?
किसी को कभी -
इन्तजार हमारा था ?
बस एक भ्रम सुहाना सा था
के उनपे अधिकार हमारा था ......
मौली