तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

मंगलवार, 25 अगस्त 2015



मोह के धागे जब तोड़ दिए तूने ओ हमदम
अब ये जुड़ते तो हैं पर चुभते भी बहुत है..
शेष है कांच की नींदें और कंकड़ के ख्वाब
ज़ख़्मी है ऑंखें लहू बन छलकते हैं आंसूं।।
                     ~~मौली~~

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