
आहत ह्रदय
एक रोज मैंने बोया पेड़ को अपने सुन्दर तन पे
एक अनूठे पवित्र प्रेम आया बहुत घमंड
का नन्हा सा बीज झुकना न था गंवारा उसको
बीज से फूटा अंकुर ना ही शाख को फैलाया
और उपजा अहसास का पौधा नहीं फूल उगे उससे
वफ़ा और समर्पण से रोपा ना कोई फल आया
करूणा के नीर से सींचा हाय नियति क्या माली की
कभी सावन की बरखा तो एक पल को उसे छाँव भी न हुआ
कभी माघ की धूप उसपे बरसाया मयस्सर
कोमल भावना के पत्तों को अवाक सा ठगा रह गया माली
देख देख मंत्रमुग्ध मैं देख पौधे का दुस्साहस
प्रेम के अंकुर से पेड़ बनने तक कब तक यूँ ही खड़ा इतराएगा
कितने किये जतन लकडहारे की नज़र से कब तक
कितनी आशायें कितने उल्लास तू बच पायेगा
जगे नित ह्रदय में मन मेरी तपस्या हुई विफल
कितनी ललक थी छावं की उसकी पर फिर भी मन में द्वन्द है
और पुष्प की, सुगंध चहुँ ओर बिखरती कितना मचा हाहाकार ह्रदय में
फल से मिटाती तृष्णा जन मानस की और हूँ मैं हताश
जब प्रेम की छाँव तलाशा क्यूंकि तू मेरा ही तो जन्माया है
तो घोर निराशा छाई तुझ में ही तो मैं हूँ मुझमे ही तू है
~~~मौली~~~
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें