माटी हूँ मैं
माटी हूँ मैं, मुझको सबब तुम्हे दे जाउंगी
कमजोर समझ रोद्र रूप धरकर कभी
करुणा से जो पृथ्वी को तहस नहस
मुझको सीचोंगे कर जाऊं मैं
शस्यपूर्ण बसुंधरा कहलाउंगी मानवता का जो
प्रेम से भी गर रौंदोगे करो उलंघन
हर सांचे में ढल जीविका बंजर मैं हो जाउंगी
उपार्जन बन जाऊं मैं सूखे और अकाल से कैसे
कुम्हारों की प्राण हूँ मैं तुम फिर बच पाओगे
किसानों की शान हूँ मैं माँ हूँ मैं
वीरों की आन भी हूँ जननी भी मैं
मानव की अंतिम सैय्या भी मैं नाज़ तेरे उठाऊंगी
कहीं कब्रगाह हूँ मैं तो कहीं लाड़ भी तुझसे लड़ाऊँगी
शमशान की लाज भी हूँ मैं माथे का तिलक बन जाऊं
गोद में मेरी निर्मल गंगा बहती फिर तू माटी का लाल कहलायेगा
जमुना, सरस्वती, नर्मदा, पद्द्मावती सम्पूर्ण विश्व में राज करेगा
आदि जाने कितनी है नदिया और भारत का परचम लहरायेगा
शोभित पर्वतराज हिमालय भी। आदर करो मेरा सम्मान करो
मुझमे ही विलीन होना है और भारत का गौरव बनो।
फिर काहे का दर्प करे आनेवाली पीढ़ी को भी तुम्हे
नर्म हूँ मैं कभी गर्म भी हूँ ही देना ये सन्देश है
कभी शीतल भी हो जाऊं मैं माँ ही माटी, माटी ही माँ है
बार बार के आघात से पर इनका न करो तिरस्कार कभी
क्षमा नहीं कर पाउंगी माटी हैं ये, नारी भी यें
उदंडता और उश्रृंखलता का इनको न कभी कमजोर समझ......
||मौली||

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