तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

सोमवार, 13 अगस्त 2018

बंद शामें

किसे बताऊं कितनी शामें बन्द कमरों में कैसे बिताई है

कितनी बेबसियों कितनी बेचैनियों में गुज़ारे हर लम्हे

सिफारिश की पिंजर से रूह के चले जाने की

न सरगोशियां ही काम आई न गुज़ारिशें मंज़ूर हुई

हिज़्र की रातें थी मेरी और सहर भी सज़ायाफ्ता

नींदे तो गिरवी रख आयी थी सपने भी बेमोल बिके

ख्वाहिशें सूद के किश्तों में बेशुमार जाने लगी

कपड़ों के बदले तन का सौदा न कर सकी कभी

मिले जो ग़म बेतहाशा उन्हें  हमसफ़र बना लिया

जिसे हमराज़ बनाया उसने ही मुझे  तार तार किया।।

                   मौली

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