विहँग नीड़
तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
सोमवार, 4 मई 2015
गुलों की भी है कितनी खूबसूरत दास्तां
किस तरह एक गुल बनाती पूरी गुलिस्तां
न होता इस जहाँ में कहीं भी वैमनस्यतां
काश के हम मानव भी होते थोड़े शाइस्ता।
~~~~मौली~~~~
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