तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
शनिवार, 3 जनवरी 2015
रिवाज़ों के घेरे में अब कैद हूँ के पंख भी अब कतरे जा चुके बेड़ियों में भी जंग लगने लगी रिसते रिसते खून जमने सा लगा के निगाहे भी अब दर छोड़ने लगी कितने दर्द सहे हैं मैंने,कितने दर्द हैं बाकी अब,कितने दर्द हैं बाकी।। ।।मौली।।
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