तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

कलम की व्यथा




कलम की व्यथा
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आज मेरी कलम ने भी धमकी दी,
मेरा साथ छोडने की,
मैं अवाक, हतप्रभ सी कलम को देखती रह गयी,
मैने प्रश्नवाचक नजरों से कलम को देखा, तो
कलम ने कहा--
क्या तुम विदित हो अपने ऊपर होते अत्याचार से,
तुम्हे आभास नही अपने बिगडते सम्बन्धो का,
मेरे-तेरे के मध्य रिश्तों ने तुझे हताहत किया,
मूढमति और मूक-बधिर बन देखती रही इसे,
इस तू-तू मैं-मैं के मँजर से
हृदय विदीर्ण हुआ,
आत्मा अन्तिम साँसें लेने लगी,
आँखों से अविरल अश्रुधार बह निकली।
यहाँ तक फ़िर भी ठीक था---
जब तक तेरे होठों से
एक आह और सिसकी भी न निकली।
तुझमे होगा धैर्य, संयम, प्रेम, सद्भावना,
पर मैं ?
मुझे तो तूने प्रेम, विरह, देशप्रेम, रिश्तों की मधुरता को
व्यक्त करने का जरिया बनाया था,
मैने न जाना कोई दूसरा दर्द,
तेरी पीडा से भी अनजान न थी मैं,
पर आज मैने बगावत की है,
तुझ पर अब और अत्याचार न होने दूँगी,
रिश्तों ने घायल किया है
तेरी आत्मा और लेखनी को
तेरी सरलता और सहजता को
उन छलावे रिश्तों को
अब न अपनाने दूँगी तुझे
बस, बहुत हो चुका
उठ, आज रच एक नई रचना
“नारी है संयम, धैर्य और प्रेम का संगम,
नारी है जननी, नारी है शक्ति, नारी है ममत्व का प्रतीक,”
सम्मान नही है नारी का
जिस धरती, देश, समाज और घर मे
विनाश ही विनाश है वहाँ
नहीं है वास देवताओं का भी वहाँ।

_____ मौली

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