इश्क में तेरे हमने ओ सनम
क्या खोया और क्या पाया
कैसे समझायें तुम्हे यूँ हम
चलो अब जाने भी दो सनम।।
हरसिंगार की झुरमुट के नीचे
चाँद के झिलमिलाते झूमर तले
बैठे थे आँखों में वीरानियाँ लिये
चलो अब जाने भी दो सनम।
डसते अब भी यादों के साँप
कोसों है दूर आँखों से नींद
सिलवटे चादर की करती बयाँ
चलो अब जाने भी दो सनम।
कितनी मिली रुसवाइयाँ
कितनी मिली महरूमियाँ
हिस्से में सिर्फ़ गुमनामियाँ
चलो अब जाने भी दो सनम।
न भूल पाऊँगीं मैं तुम्हे कभी
न फ़िर अब जी पाऊँगी कभी
अधूरे अनगिनत ख्वाबों के पल
चलो अब जाने भी दो सनम।।
__ मौली

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