विहँग नीड़
तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
रविवार, 1 मार्च 2015
११७-
आते बसन्त को भला कब रोक पाया कोई
पतझड़ के कहर से है कब बच पाया कोई
शाश्वत है जीवन का इसे कैसे नकारे कोई
सत कर्मों से ही अब इसे संवारो हर कोई।।
__ मौली
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