तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 5 मार्च 2015

१३२- प्रेम-सन्देश





कहते उसको सब आवारा
नहीं था कोई वो नाकारा
फ़ैलाने चहुँ ओर भाईचारा
गाता जाता धूनी रमाता
फ़िरता लिये इकतारा
हर गली और चौबारा
प्रेम की बहाता धारा
था तो वो इक बंजारा
उसका था एक ही नारा
होगा खुशहाल जग सारा।

होता देख व्यभिचार
रोता वो जार-जार
कैसे रोके अनाचार
नहीं कहीं अब सदाचार
न आस्था न ही सुविचार
न ही दीखता है संस्कार
करता दिल हाहाकार
हरतरफ़ है लूटमार
मिलता नहीं शुभ समाचार।

धर्म के नाम पर मारामारी
है फ़ैली कुत्सित महामारी
पाखण्डी और दुराचारी
बंजारे की थी मती मारी
उसकी युक्ति सबने ठुकराई
दिया जग ने उसको रुसवाई
खो गया न जाने कहाँ हरजाई
न आयेगा फ़िर कभी वो शैदाई
न आयेगा फ़िर कभी वो शैदाई।।

__ मौली

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