माँ के आँचल तले
किलकारी करते
घुटनों चलते
हँसते-हँसाते
रूठते-मनते
बाबुल के आँगन की मैं एक कली
आजाद परिन्दों सी उड़ती
इधर-उधर मँडराती थी।
भयावह सपनों के डर से
दुबक जाती थी माँ की गोद में,
आँचल में छिपाकर दुलराती,
ममत्व लुटाती, बल्लैयाँ लेती
मेरी माँ।
आजाद परिन्दों के मानिन्द मैं
बे-खौफ़ उड़ाने भरती दिन-रात,
समाज के रस्मों-रिवाज को
समझाती - बुझाती
नारी के गुणों-सँस्कारों से सँवारती
मेरी माँ।
हर दिन मेरे घर लौट के न आने तक
राह में नजरें बिछाये
अपलक दरवाजे को निहारती
मेरी माँ।
मेरे लौट कर आते ही
अपने सीने में
मुझे समेट लेती
मेरी व्याकुल माँ।
मनपसन्द पकवान बना
अपने हाथों से निवाला खिलाती
मेरी माँ।
दिनभर की भाग-दौड़ से
थक कर जब मैं सोती,
अपनी गोद में मेरा सिर रख कर
थपथपाती, लोरी सुनाती
मेरी माँ।
उनके गले में जब मैं बाहें डाल
उनसे लाड़ लड़ाती
मीठी झिड़की से परे हटाती
मेरी माँ।
जिसके सीने में लग कर
सारे राज आम हो जाते,
जिनकी थपकियों तले
सारे सपने साकार हो जाते,
जिसके चरणों तले
स्वर्ग के द्वार मिल जाते,
ममतामयी - करुणामयी
मेरी माँ।
मेरे कदमों से कदम मिलाती
मुझको उड़ान भरना सिखाती
ममत्व से ओत-प्रोत
अँधेरे में रोशनी दिखाती
मेरी माँ।
पर, हाय रे दुर्भाग्य !
ये क्या सूझा तुझे
मेरी इतनी सी खुशी
गवारा न हुई तुझको
या शायद
तुझे मालूम नहीं
क्या होती है माँ।
क्रूर नियति ने
सब कुछ तो छीना मुझसे
मेरी खुशियाँ, मेरे सपने,
मेरा बचपन, मेरा यौवन
अब न छीनने दूँगी तुझको
मुझसे मेरी माँ।
मेरी आस, मेरी साँस
मेरी दौलत, मेरी दुनिया
समन्दर से गहरी
मेरी जननी
मेरी माँ।
माँ ! माँ !! माँ !!!
करती मैं
झकझोरती उस निष्प्राण पिंजर को
न हलचल थी कोई, न था स्पन्दन
आँखों से बहती अविरल अश्रुधार
और उखड़ती साँसों को सहेजती
कुछ कहने की भरसक कोशिश करती
मानों मुझसे बिछडने का दर्द लेकर
चली वो परब्रह्म में लीन होने
मैं चीखती -चिलाती
विलाप करती
झकझोरती उस निष्प्राण पिंजर को
मेरी माँ ! मेरी माँ !!
फ़िर न लौटेगी कभी मेरी माँ
काँधे पर ले कर चली
श्मशान की ओर
करने पँचतत्व में विलीन
मुखाग्नि की रस्मों से
अस्थि-विसर्जन तक साथ रही
मेरी माँ।
खाली हाथ जब घर लौटी
द्वार निहारते नहीं मिली मेरी माँ
अब कभी न लौटेगी मेरी माँ
मेरी प्यारी माँ।
__ मौली

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