जरा ठहरो तो........
फ़ेर के निगाहें जाने वाले।
भ्रम के मायाजाल से निकलने तो दो
रिश्ते के ढ़ाई आखर को सहेजने तो दे
पन्ने वो भरोसे के बटोरने तो दे.........।
चले जाना...........
के पलकों के कतारों को भीग जाने तो दे
सिरहाने रख दूँ दुआएं ये, मोहलत तो दे
फ़रेब की सिलवटों को
जी भर के फ़िर देखने तो दे...............।
जा............
के अब न मिलूँगी फ़िर दोबारा
बुत मे जरा तब्दील होने तो दे।
बुत मे जरा तब्दील होने तो दे।।
__ मौली

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