ठिठुरती सर्दी और कोहरे का कहर
सब ओढ़े हुए स्वेटर, कोट और शाल
और वो वहाँ कौन है? चिथड़ो मे......
कभी खुद का तन ढ़ाँपती
तो कभी दुधमुँहे नवजात को।
छाती से चिपकाये निरंतन क्रन्दन करते
भूख से बिलखते बच्चे के दूध के लिये
गुहार लगाती तो कभी चिलाती बचाती
अपनी लुटती अस्मत को.........।
नहीं पसीजा दिल किसी इंसान का
चटकारे लेते चाट-बताशे खाते हुए
देखते रहे जिस्म के भूखे भेड़ियों के
हवस का शिकार बनते उस बुधिया को
हाँ यही नाम था उस पगली का।
खींच रहे थे उसकी गोद से
दूध-विहीन स्तन से दुग्ध-पान करने की
अनायास चेष्टा करते उस नवजात को।
आखिर काली ठिठुरती रात को भी
शर्मसार कर दिया हैवानों ने।
कितनी बुधिया रोज शिकार होती रहेंगी
कब तक ह्रास होता रहेगा मानवता का
कब जागेंगें हम कब खत्म होगी बर्बरता...।
कुछ तो फ़र्ज निभाओ मानवता का
कुछ तो कर्ज निभाओ धरित्री का
कुछ तो कर्ज निभाओ धरित्री का।।
__ मौली

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