तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
बुधवार, 11 फ़रवरी 2015
८०- लो मैं बिखर गयी
मैं संगेमरमर की दीवार नहीं हूँ...........
मैं तो रेत की दीवार हूँ
क्यों मुझे बार-बार अपने तँज से ढ़हाते हो.....
अब मुझमे सामर्थ्य नहीं
जो खुद को समेट-सहेज सकूँ.........
आखिर, रेत को तो बिखरना ही था न.....
सो, लो मैं बिखर गयी.......।।
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