तुम जा रहे हो आज फ़िर वापस न आने के लिये...
चाहा तुम्हे पकड़ लूँ, जकड़ लूँ अपनी मुट्ठी में........
पर तुम रेत की मानिन्द फ़िसलते जा रहे हो...........।
कितने सुनहरे पल मिले तो कुछ बिखरे रिश्ते
पर......... निर्मोही............
तू क्या जाने क्या खोया क्या पाया हमने....
न अंतर्मन है न स्पंदन है.....................
क्योंकि तू तो है समय.....................।
चलायमान गतिमान..................
हम कठपुतले फ़िर से
तेरे नये रूप के स्वागत में
मंच और सपने सजाये
एक नया तमाशा प्रस्तुत करेंगें.....
विधाता के कठपुतले हैं हम सब
यही हमारी रंगशाला है............
रिश्तों के धागों को थामे
कर्म रूपी नाच नचायेगा..........
हाड़ मांस के कठपुतलों को
फ़िर सपने दिखलायेगा........
फ़िर सपने तोडेगा..............
तू ही तो है समय.............।
तू ही तो है समय..............।।
__ मौली

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