तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

११५- अब कितने दर्द हैं बाकी





रिवाज़ों के घेरे में अब कैद हूँ
कि पँख भी अब कतरे जा चुके
बेड़ियों में भी जँग लगने लगी
रिसते-रिसते खून भी जमने लगा
कि निगाहें भी अब दर छोछने लगीं
कितने दर्द सहे हैं मैने...............
कितने दर्द हैं बाकी अब...................।
कितने दर्द हैं बाकी.........................।।

__ मौली

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें