रिवाज़ों के घेरे में अब कैद हूँ
कि पँख भी अब कतरे जा चुके
बेड़ियों में भी जँग लगने लगी
रिसते-रिसते खून भी जमने लगा
कि निगाहें भी अब दर छोछने लगीं
कितने दर्द सहे हैं मैने...............
कितने दर्द हैं बाकी अब...................।
कितने दर्द हैं बाकी.........................।।
__ मौली
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