विहँग नीड़
तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015
८२-
जार-जार रुलाया है दुनिया ने मुझको
अब किसी गम से आँखे नम नहीं होती
बेइंतहा ज़ख्म दिये है ज़िंदगी ने मुझको
अब कोई चोट मुझे टिस नहीं देती।।
__ मौली
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें