तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़
बुधवार, 11 फ़रवरी 2015
७९- खामोश होठ
मेरे खामोश होठों का
कोलाहल गर सुन पाते तुम............
तो यूँ अपने तँज से
मुझे घायल न कर जाते...............
न दे सके
मुझे वफ़ा की चारदीवारी तो क्या...........
खारों की सेज को ही
अब आशियाना बना लिया.......।।
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