भँवरा था वो मनचला
कुछ बहका कुछ अनमना
मकरंद की थी उसकी लालसा
एक रोज हुआ एक हादसा
एक फ़ूल को हुई उससे मोहब्बत
पर हरजाई हर फ़ूल पे था मंडराता
बेवफ़ाई थी उसकी फ़ितरत
इंतजार करती आखिर वो कहाँ तक
वो फ़ूल होती हरपल हताहत
भँवरे ने किया उसे मर्माहत
फ़ूल की यही थी किस्मत
मुरझा गयी वो यकायक
फ़िर भी न लौटा वो भँवरा
आता भी कैसे?
वो तो था आवारा
हर फ़ूल का दीवाना
दिया प्यार का ये नजराना
फ़ूल को ही पड़ा मुरझाना
भँवरा था वो दीवाना।।
__ मौली

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