तुम्हारी खोज से क्लान्त हो आश्रय लिया जहाँ....... वो है विहँग नीड़

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

७८- काँटों सजा गुलाब





उस रोज तुमने मुझे
काँटों से सजा एक गुलाब दिया था.....
गुलाब की सुगँध और ताजगी
चन्द घन्टों में खत्म हो गयी थी
और अहसास भी.................
पर काँटे आज भी ताजे हैं
और उनकी चुभन के घाव.....
अब नासूर बन गये.......।
अब नासूर बन गये.......।।

__ मौली

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें